Atharvashirsha Pdf Download in Hindi

Atharvashirsha भगवान गणपति को समर्पित है , गणेश महोत्सव के दिनों में रोज Atharvashirsha का पाठ सुने , इस ग्रन्थ के अनुसार ही एक द्वंत के नाम से श्री गणेश को हम जानते हैं ! इससे आपका दृढ़ता दूर होगा , धन की प्राप्त होगा ! गणेश Atharvashirsha पाठ बहुत ही लाभदायक सवित होता है !

Atharvashirsha

What is Atharvashirsha ?

हे गणपति भगवान हम हमेशा ऐसा बाते सुने जो हमें सुख और शांति दे , एवं हमेशा बुराइयों से बचाये !हमारा जीवन हर किसी को भलाई में व्यतीत हो . हम हमेशा भगवन के पूजा में लगे रहे ! बुरा बाते और बुरे लोगो से हमेशा दुरी बनाये रखे , हमारा स्वास्थ हमेशा ठीक रहे !

जिससे हम अपना तन ,मन और धन से परमात्मा का सेवा कर सके , हम कभी दुनिया के सुखो में लीन न रहे एवं दुनिया के भोग विलाश से हमेशा दूर रहे ! हमारे हर दुखो का निवारण करे !

जिनकी कृति चारो तरफ फैली हुई वह देवो के राजा इंद्र हमेशा हर जगह विराजमान है , बुद्धि के मालिक श्री ब्रिह्श्पति समस्त देवो के छिपी हुई शक्तिया हैं जो जो हर देवो का स्वाभिमान के रूप में कार्य करती हैं ! यह हर उतम कार्य एवं शुभ कार्य के सहयोगी होते हैं ! इनसे हर मनुष्यों का भला होता है

Atharvashirsha Path

हे श्री गणेश आप ही कार्य हैं , आप ही करता हैं , आप ही दुशरो के दुखो के हरने वाले हैं आप ब्रम्ह हो ,आप ही विष्णु हो ,आप ही महेश हो , आप सब रूपों में विराजमान हो , आप सब में व्याप्त हो , आप ही आत्मा का स्वरुप हो ! आप ही इस्वर हैं आप ही सैट स्वरुप हैं !

आप हमारा रक्षा करें , बोलने बालो को रक्षा करें ,सरे लोगो को रक्षा करें सुनने बाले को रक्षा करें , पतन करने वाले की रक्षा करे शिष्यों की रक्षा एव भला करें ! चारो दिशायो से हमें रक्षा करें, आप ही भला करने वाले आनंद स्वरुप हैं !

आप दया के सागर हैं , आप ज्ञान एवं विज्ञानं में समाहित है , आप से सारा संसार उत्पन होता है , आप में ही स्थित होता है और आप में समा जाता है ! आप ही पाचो तत्व हैं , सरे श्रृष्टि में भी आप ही विराजमान हैं !

आप लोभ ,लालच ,मोह , माया से मुक्त हो . आप काल से परे हो , आप सर्व शक्तिमान हो , ऋषि मुनि सब आप को भाते हैं !ब्रम्भा ,विष्णु , रूद्र , इंद्र सब आप ही हो ! सूर्य ,चन्द्रमा , अग्नि , वायु सब आप ही हो , आप ब्रम्ह हो , ओंकार भी आप ही हो !
इस महा मन्त्र का लिखने वाला ऋषि गणक हैं, गणपति देवता है ! एक द्वंत के नाम से श्री गणेश को हम जानते हैं !

Ganesh Atharvashirsha

ॐ नमस्ते गणपति। त्वमेव प्रत्यक्ष तत्त्वमसि

ट्वेमेव एकमात्र कर्ता है

त्वामेव केवलं धरातारसी

त्वामेव केवल हरत्रत्रस्य

तवमेव सर्वम् खलविदम् ब्रह्मसि

गति साक्षाद्मा सा सि नित्यम्।।१ ।।

रितम वचमी। सत्यं वच्चि।।२ ।।

असल में। अब बोलने वाले।

अब सुनने वाले। अब दाता।

अव धताराम। अवनुचनमव शिष्य।

अब के बाद। अब पुरस्कृत किया गया।

एवोत्ताराट। अब दक्षिण की ओर।

अवचोर्धवत्तात् ।। अवधरावत ।।

सर्वतो मा पही-पही समंतात्।।3 ।।

त्वं वा चिन््⁇ मयस्त्वं चिन्मयः।

तवमानंदमासयस्त्वं ब्रह्ममायाः।

त्वं सच्चिदानंदाद्व और नमो ंद सि।

आप प्रत्यक्ष ब्रह्माजी हैं।

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयो। स च।।4 ।।

सारा संसार छूट गया।

सर्वं जगदीदं त्वत्सतिष्ठति।

सर्वम जगदीदम् त्वाय लीमस्याति।

सारा संसार तुम्हारा है।

त्वं भूरापो न⁇ नलो भूमि निलो नभः।

त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।५ ।।

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः।

त्वं देहत्रयायनः। त्वं कालरात्रयातीतः।

आप हमेशा आधार स्थिति में होते हैं।

त्वं शक्तितेयात्मकः।

त्वं योगिनो ध्यायं नित्यम्।

आप ब्रह्मा हैं, आप विष्णु हैं

रुद्रस्तवम् इन्द्रस्तवम् अग्निस्तवम्

वायुस्तवम् सूर्यस्तवम् चन्द्रमस्तवम्

ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम।।६ ।।

इसके बाद गणदी पुरुमुचार्य वर्णनादिन।

अनुस्वार: परत:। अर्धेन्दुल स्वभाव।

तारेन ऋद्धिं। एतत्त्वं मनुस्वरुपम्।

गकर: प्रस्तावना। अकारो मध्यरूपम।

असुरस्वरचित्त्यरूपं। बिन्दुरुतरूपम्।

नाद: सन्धानम्। राष्ट्रमंडल:

सायशा गणेश विद्या गणकारिशी:

निचृद्गायात्रिच्छंदः। गणपतिदेवता।

ओम गं गणपतये नम: ।। 7 ।।

एकदंत्याय विद्महे।

वक्रतुण्डाय धीमहि।

तन्नो दन्ति प्रचोदयात्।।8 ।।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकशादिमानम्।

रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।

रक्त इयरलोब के लंबवत है।

रक्तगंधा ुल नुलिप्तांगं रक्तपुष्प: सुपुजितम् ।।

भक्तनुकंपिनं देवं जग रैपणमच्युतम्।

अविवरबं च चर्त्यदौ प्रकृ पुरुष ते पुरुष प्रतिपरम्

और इस नित्य योगी योगिन का ध्यान: ।। ९ ।।

नमो व्रतपतये। नमो गणपतिाय।

Ha नम: प्रमथपतये।

नमस्ते य स्तुलिंगोदरायैकदंताय।

विघ्नकारी शिवसुताय।

श्रीवरमूर्तये नमो नम: ।। १० ।।

एतदथर्वशीर्ष यो द धीते।

ब्रह्मबुद्धि की कल्पना करो।

सभी बाधित हैं।

सब ठीक हैं।

स पशचमहापाप्रपादिस्तेते।।११ ।।

दिन के पापों को नष्ट करो।

प्रादृद्ध्यानो रतिरचितं पाप नास्ति।

संध्याः प्रयाञ्जनोत्तराप्पो भवति।

सर्वत्रानिलानो वि पविघ्नो भवति।

धर्मार्थपादमोक्षं च विन्दति।।१२ ।।

इदमथर्वशीर्षमिश्राय न नम्।

अगर ऐसा नहीं है।

सहस्रावर्तनायम यम कामादिते तम तेनन दुखयते।।13 ।।

अनेन गणपतीमभिंशति

वाग्मी भवति

चतुर्थयमानशरणं जपति

विद्वान भवति।

इत्याथर्वणवाक्यं।

ब्रह्मादिवर्णम विदित

न बिभतेतिचचनेति।।१४ ।।

यह दुर्वांकुरैनाचार्य की तरह है

वैष्णवनोपम की भवति।

यह शर्मनाक दिन है

मेधावी भविष्य।

यह मोदक सहस्रेन यजति है

वांछित फल।

य: सजयसिमिदभिरजति

स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।१५ ।।

आठवाँ ब्राह्मण सम्यग्ग्रहितव

सूर्यवर्चस्व भवति।

सूर्य ग्रह, महान नदियाँ, मूर्तियाँ

या जपत्व सिद्धमन्त्र भवति।

महाविघ्ननात्प्रिम्यते।

महादोष युक्तप्राइम्यते।

महापापत प्रमुच्यते।

सर्वविद्याभवति से सर्वविद्यावती।

य और वेद इत्त्युपनिषद।

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