Shiv Chalisa Pdf Download in Hindi | Shiv Chalisa Lyrics in Hindi

Shiv Chalisa PDF क्या है और उसकी महिमा क्या आज हम उसी के बारे में जानने वाले है और साथ में मैं आप सभी को Shiv Chalisa Pdf भी देने वाले है, जिसे आप यहाँ से Download कर सकते है!

भगवान् शिव अपने भक्तो पर बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते है! भोलेनाथ को उनकी सौम्य आकृति के साथ उन्हें रूद्र रूप के लिए भी जाना जाता है! वेदों के अनुसार भक्त शिव चालीसा का अनुसरण अपने जीवन में आने वाले कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करने के लिए करते है!

Why should one recite Shiv Chalisa

Shiv Chalisa के माध्यम से आप भी अपने जीवन में आने वाले परेशानी और बाधाओं को दूर कर सकते है! शिव चालीसा का अनुसरण करके शिव भगवान् की अपार कृपा प्राप्त कर सकते है! व्यक्ति के जीवन में शिव चालीसा का महत्त्व है!

शिव चालीसा के सरल शब्दों से भगवान् शिव को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है! शिव चालीसा के के मदद से कठिन से कठिन काम को आसानी से किया जा सकता है! शिव चालीसा के 40 पंक्तियाँ सरल शब्दों में विद्यमान है! इसकी महिमा अपार है, भगवान शिव, भोले स्वभाव के होने के कारण भोलेनाथ कहलाते है ! और वे शिव चाहिए के पाठ से भक्तो पर बहुत ही आसानी से प्रसन्न हो जाते है! और उनकी मनोकामना को पूरी करते है!

Method of reciting Shiv Chalisa

Shiv Chalisa PDF FREE download

सुबह जल्दी उठकर स्नान करे और साफ सुथरे कपडे पहने, अपना मुहं पूर्व दिशा में रखे और कुशा के आसन पर बैठे! पूजन में सफेद चन्दन, चावल , कलावा, धुप – दीप, पीले फुल की माला और हो सके तो सफ़ेद आँख के 11 फुल भी रखे! और शुद्ध मिश्री को प्रसाद के लिए रखे!

Shiv Chalisa पाठ करने से पहले गाय के घी का दिया जलाए, और एक लोटे में शुद्ध जल भरकर रखे! भगवान् शिव चालीसा का तीन या पांच पर पाठ करे ! पाठ आप बोलकर करे, जितने भी लोगो को यह सुनाई देगा, उनको भी लाभ होगा, शिव चालीसा का पाठ पूर्ण भक्ति भाव से करे और भगवान शिव को प्रसन्न करे! पाठ पूरा हो जाने पर लोटे के जल को सारे घर में छिड़क दे! थोडा सा जल आप स्वयम पी ले, और मिश्री को प्रसाद के रूप में खाए और सबको भी बांटे!

how shiv chalisa will fulfill your wish

अगर आप अपनी मनोकामना को जल्द से जल्द पूरी करना चाहते है तो आपको ब्रम्ह मुहूर्त में आप एक सफेद आसन पर बैठे, उतर-पूर्व या पूर्व दिशा को तरफ मुख करके बैठे, गाय के घी का दिया जलाकर शिव चालीसा का 11 बार पाठ करे! जल का पात्र रखे और मिश्री का भोग लगाये! एक बेलपत्र भी शिवलिंग पर अर्पण करे ! मनचाहे वरदान की इच्छा करे और यह पाठ चालीस दिन तक लगातार करे! इससे आपको आपका मनचाही मनोकामना जरुर पूरी होगी!

Benefits of Shiv Chalisa | शिव चालीसा के फायदे

Shiv Chalisa का पाठ भक्त गण भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिए करते है! श्रवण के महीने में शिव चालीसा का बहुत महत्व होता है! शिव चालीसा भगवान् शिव को खुश करने का सबसे सरल और आसान उपाय होता है!

  • श्रावण के समय शिव चालीसा का पाठ करना ज्यादा लाभकारी होता है! इससे भगवान् शिव प्रसन्न होकर मनचाहा फल देते है! बीमार व्यक्ति की बीमारी ठीक होती है और साथ ही आपको हर खतरे से बचाता है!
  • अगर गर्भवती महिलाएं शिव चालीसा का पाठ करती है तो उनके होने वाले बच्चे के लिए सही रहता है!
  • धन लक्ष्मी के लिए हर रोज इसका पाठ सुबह ११ बजे करे, इससे आपकी मनोकामना जल्द पूर्ण होती है!
  • कुंडली में होने वाले अशुभ ग्रहों का प्रभाव नही रहता है!
  • शिव लिंग की पूजा करने से व्यक्ति के ग्रह -गोचर उसके अनुकूल होने लगते है!
  • आपके घर में होने वाले नकारात्मक शक्तियाँ दूर हो जाती है तथा आपका घर पॉजिटिव एनर्जी से भर जाता है!

Shiv Chalisa Lyrics in Hindi

।।दोहा।।

|| श्री शिव चालीसा चौपाई ||


जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अर्थ:  हे गिरिजा पति हे, दीन हीन पर दया बरसाने वाले भगवान शिव आपकी जय हो, आप सदा संतो के प्रतिपालक रहे हैं। आपके मस्तक पर छोटा सा चंद्रमा शोभायमान है, आपने कानों में नागफनी के कुंडल डाल रखें हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

अर्थ: आपकी जटाओं से ही गंगा बहती है, आपके गले में मुंडमाल (माना जाता है भगवान शिव के गले में जो माला है उसके सभी शीष देवी सती के हैं, देवी सती का 108वां जन्म राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री के रुप में हुआ था। जब देवी सती के पिता प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान किया तो उन्होंने यज्ञ के हवन कुंड में कुदकर अपनी जान दे दी तब भगवान शिव की मुंडमाला पूर्ण हुई। इसके बाद सती ने पार्वती के रुप में जन्म लिया व अमर हुई) है। बाघ की खाल के वस्त्र भी आपके तन पर जंच रहे हैं। आपकी छवि को देखकर नाग भी आकर्षित होते हैं।

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

अर्थ: माता मैनावंती की दुलारी अर्थात माता पार्वती जी आपके बांये अंग में हैं, उनकी छवि भी अलग से मन को हर्षित करती है, तात्पर्य है कि आपकी पत्नी के रुप में माता पार्वती भी पूजनीय हैं। आपके हाथों में त्रिशूल आपकी छवि को और भी आकर्षक बनाता है। आपने हमेशा शत्रुओं का नाश किया है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

अर्थ: आपके सानिध्य में नंदी व गणेश सागर के बीच खिले कमल के समान दिखाई देते हैं। कार्तिकेय व अन्य गणों की उपस्थिति से आपकी छवि ऐसी बनती है, जिसका वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

अर्थ: हे भगवन, देवताओं ने जब भी आपको पुकारा है, तुरंत आपने उनके दुखों का निवारण किया। तारक जैसे राक्षस के उत्पात से परेशान देवताओं ने जब आपकी शरण ली, आपकी गुहार लगाई।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

अर्थ: हे प्रभू आपने तुरंत तरकासुर को मारने के लिए षडानन (भगवान शिव व पार्वती के पुत्र कार्तिकेय) को भेजा। आपने ही जलंधर (श्रीमद‍्देवी भागवत् पुराण के अनुसार भगवान शिव के तेज से ही जलंधर पैदा हुआ था) नामक असुर का संहार किया। आपके कल्याणकारी यश को पूरा संसार जानता है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

अर्थ: हे शिव शंकर भोलेनाथ आपने ही त्रिपुरासुर (तरकासुर के तीन पुत्रों ने ब्रह्मा की भक्ति कर उनसे तीन अभेद्य पुर मांगे जिस कारण उन्हें त्रिपुरासुर कहा गया। शर्त के अनुसार भगवान शिव ने अभिजित नक्षत्र में असंभव रथ पर सवार होकर असंभव बाण चलाकर उनका संहार किया था) के साथ युद्ध कर उनका संहार किया व सब पर अपनी कृपा की। हे भगवन भागीरथ के तप से प्रसन्न हो कर उनके पूर्वजों की आत्मा को शांति दिलाने की उनकी प्रतिज्ञा को आपने पूरा किया।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

अर्थ: हे प्रभू आपके समान दानी और कोई नहीं है, सेवक आपकी सदा से प्रार्थना करते आए हैं। हे प्रभु आपका भेद सिर्फ आप ही जानते हैं, क्योंकि आप अनादि काल से विद्यमान हैं, आपके बारे में वर्णन नहीं किया जा सकता है, आप अकथ हैं। आपकी महिमा का गान करने में तो वेद भी समर्थ नहीं हैं।

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

अर्थ: हे प्रभु जब क्षीर सागर के मंथन में विष से भरा घड़ा निकला तो समस्त देवता व दैत्य भय से कांपने लगे (पौराणिक कथाओं के अनुसार सागर मंथन से निकला यह विष इतना खतरनाक था कि उसकी एक बूंद भी ब्रह्मांड के लिए विनाशकारी थी) आपने ही सब पर मेहर बरसाते हुए इस विष को अपने कंठ में धारण किया जिससे आपका नाम नीलकंठ हुआ।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

अर्थ: हे नीलकंठ आपकी पूजा करके ही भगवान श्री रामचंद्र लंका को जीत कर उसे विभीषण को सौंपने में कामयाब हुए। इतना ही नहीं जब श्री राम मां शक्ति की पूजा कर रहे थे और सेवा में कमल अर्पण कर रहे थे, तो आपके ईशारे पर ही देवी ने उनकी परीक्षा लेते हुए एक कमल को छुपा लिया। अपनी पूजा को पूरा करने के लिए राजीवनयन भगवान राम ने, कमल की जगह अपनी आंख से पूजा संपन्न करने की ठानी, तब आप प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर प्रदान किया।

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

अर्थ: हे अनंत एवं नष्ट न होने वाले अविनाशी भगवान भोलेनाथ, सब पर कृपा करने वाले, सबके घट में वास करने वाले शिव शंभू, आपकी जय हो। हे प्रभु काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार जैसे तमाम दुष्ट मुझे सताते रहते हैं। इन्होंनें मुझे भ्रम में डाल दिया है, जिससे मुझे शांति नहीं मिल पाती। हे स्वामी, इस विनाशकारी स्थिति से मुझे उभार लो यही उचित अवसर। अर्थात जब मैं इस समय आपकी शरण में हूं, मुझे अपनी भक्ति में लीन कर मुझे मोहमाया से मुक्ति दिलाओ, सांसारिक कष्टों से उभारों। अपने त्रिशुल से इन तमाम दुष्टों का नाश कर दो। हे भोलेनाथ, आकर मुझे इन कष्टों से मुक्ति दिलाओ।

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

अर्थ: हे प्रभु वैसे तो जगत के नातों में माता-पिता, भाई-बंधु, नाते-रिश्तेदार सब होते हैं, लेकिन विपदा पड़ने पर कोई भी साथ नहीं देता। हे स्वामी, बस आपकी ही आस है, आकर मेरे संकटों को हर लो। आपने सदा निर्धन को धन दिया है, जिसने जैसा फल चाहा, आपकी भक्ति से वैसा फल प्राप्त किया है। हम आपकी स्तुति, आपकी प्रार्थना किस विधि से करें अर्थात हम अज्ञानी है प्रभु, अगर आपकी पूजा करने में कोई चूक हुई हो तो हे स्वामी, हमें क्षमा कर देना।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

अर्थ: हे शिव शंकर आप तो संकटों का नाश करने वाले हो, भक्तों का कल्याण व बाधाओं को दूर करने वाले हो योगी यति ऋषि मुनि सभी आपका ध्यान लगाते हैं। शारद नारद सभी आपको शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

अर्थ: हे भोलेनाथ आपको नमन है। जिसका ब्रह्मा आदि देवता भी भेद न जान सके, हे शिव आपकी जय हो। जो भी इस पाठ को मन लगाकर करेगा, शिव शम्भु उनकी रक्षा करेंगें, आपकी कृपा उन पर बरसेगी।

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

अर्थ: पवित्र मन से इस पाठ को करने से भगवान शिव कर्ज में डूबे को भी समृद्ध बना देते हैं। यदि कोई संतान हीन हो तो उसकी इच्छा को भी भगवान शिव का प्रसाद निश्चित रुप से मिलता है। त्रयोदशी (चंद्रमास का तेरहवां दिन त्रयोदशी कहलाता है, हर चंद्रमास में दो त्रयोदशी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में व एक शुक्ल पक्ष में) को पंडित बुलाकर हवन करवाने, ध्यान करने और व्रत रखने से किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ: जो कोई भी धूप, दीप, नैवेद्य चढाकर भगवान शंकर के सामने इस पाठ को सुनाता है, भगवान भोलेनाथ उसके जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करते हैं। अंतकाल में भगवान शिव के धाम शिवपुर अर्थात स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उसे मोक्ष मिलता है। अयोध्यादास को प्रभु आपकी आस है, आप तो सबकुछ जानते हैं, इसलिए हमारे सारे दुख दूर करो भगवन।

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

बोलो शिव शंकर भगवान की जय ||

Shiv Chalisa Pdf Download in Hindi

अगर आप शि Shiv Chalisa Pdf Download करना चाहते है तो आप हमारे नीचे दिए गये Download Button पर Click करके Download कर सकते है!

General FAQ About Shiv Chalisa PDF

शिव चालीसा का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

नियमित रूप से शिव चालीसा का पाठ ११ बार करना चाहिए, इसे लगातार 6 महीने से लेकर 1 साल तक करने से आपका शिव चालीसा सिद्ध हो जाता है! अगर आप इसका पाठ १०८ बार करते तो इसे सिद्ध करने के लिए ४१ दिन पर्याप्त होते है!

शिव चालीसा का पाठ कैसे करते हैं?

शिव चालीसा पढने से पहले शिव जी के प्रतिमा के सामने घी का दिया जलाये और उनका ध्यान लगाकर शिव चालीसा का पाठ शुरू कर सकते है !

डिस्क्लेमर:- हिंदी ज्ञान किसी भी पीडीऍफ़ फाइल पर मालिकाना हक़ नही रखता है, हमने सारे पीडीऍफ़ को सिर्फ शिक्षा के उद्देश्य से यहा पर दिया है, अगर किसी को भी कोई आपत्ति है, तो वह मुझसे ईमेल [email protected] पर सम्पर्क कर सकते है! हम इस पर तुरंत कोई निर्णय लेंगे!

Tags:-

“Keyword” “shiv chalisa pdf download”, “shiv chalisa pdf in english” “shiv chalisa pdf gujarati”, “shiv chalisa pdf in punjabi” , “shiv chalisa pdf raftaar” , “shiv chalisa pdf in bengali” , “shiv chalisa pdf in marathi” , “shiv chalisa pdf voidcan” , “shiv chalisa pdf geeta press gorakhpur” , “shri shiv chalisa pdf”
“complete shiv chalisa pdf” , “shiva chalisa pdf” , “shiv ji chalisa pdf” , “shiva chalisa pdf english” , “shiva chalisa pdf in telugu”